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बवासीर (Piles) के कारण, लक्षण और सटीक इलाज: डॉ. पुनीत अग्रवाल का मार्गदर्शन

बवासीर (Piles या Hemorrhoids) एक ऐसी समस्या है जिससे आज के समय में बहुत से लोग पीड़ित हैं, लेकिन संकोच के कारण सही समय पर डॉक्टर से सलाह नहीं ले पाते। आगरा में पिछले 40 वर्षों के अपने सर्जिकल अनुभव में मैंने देखा है कि सही जानकारी और समय पर इलाज से इस समस्या को जड़ से खत्म किया जा सकता है।

इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि बवासीर क्या है, इसके मुख्य लक्षण क्या हैं और आधुनिक लेजर सर्जरी (Laser Surgery) कैसे इस बीमारी का सबसे सरल समाधान है।

बवासीर (Piles) क्या है?

हमारे मलद्वार (Anus) के आसपास की नसों में जब सूजन आ जाती है, तो उसे बवासीर या पाइल्स कहा जाता है। यह सूजन अंदरूनी (Internal) भी हो सकती है और बाहरी (External) भी। अक्सर पुरानी कब्ज या गलत खान-पान इसका मुख्य कारण होता है।

Piles symptoms and treatment by Dr. Puneet Agrawal


बवासीर हिंदी में और इंग्लिश में पाइल्स तथा आयुर्वेद में अर्श बोलते हैं 

प्रकृति ने हमारी गुदा के अंदर मुलायम ऊतकों के तीन उभार - कुशन बनाये हैं।  ये उभार  हमारी गुदा का  रास्ता अंदर से कस कर बंद रखते हैं तथा वक्त बेवक्त पाद  या मल को बाहर नहीं निकलने देतें है ।  जब हम शौचालय में होते हैं तब ये उभार  ढीले हो जाते हैं तथा वायु, पाद, मल आदि को बाहर निकलने देते हैं।  जब यह ऊतक  सही प्रकार से कार्य नहीं करते हैं या उनकी संरचना में परिवर्तन आ जाता है तब बवासीर अथवा पाइल्स बनना प्रारंभ हो जाते हैं। 

कहने सुनने में बवासीर एक साधारण बीमारी लगती है।  लेकिन कभी कभी ये भयानक रूप ले लेती है, और जानलेवा साबित होती है। समय रहते इससे बचाव करना अत्यंत आवश्यक है। 

यहाँ पर मैं बवासीर के कुछ प्रमुख कारण बता रहा हूँ।  साथ में ये भी बता रहा हूँ कि उनसे कैसे बचा जाये। एक बार बवासीर होने पर इन सावधानियों का और ज्यादा अमल में लाना चाहिये। 


बवासीर होने के प्रमुख कारण 

१  कब्ज या लंबे समय तक दस्तों का लगे रहना 

२  आनुवांशिक

३  खाने  में रेशे की कमी होना 

४  शरीर का अधिक वजन होना, मोटापा 

५  गर्भावस्था 

६  हाईली प्रोसेस फूड को अधिक खाना

७  वह लोग जो बहुत देर तक एक ही जगह पर बैठे या खड़े रहते हैं

८  शौच के समय अधिक जोर लगाना 

९  शौच में कमोड के ऊपर अधिक समय बिताना


कब्ज 

बवासीर होने का सबसे प्रमुख कारण है कब्ज।  यदि हमें लंबे समय तक कब्ज बना रहता है तो हमारी आंतों को शौच करने में काफी मेहनत करनी पड़ती है, बहुत जोर लगाना पड़ता है।  जोर लगाने के कारण गुदा मार्ग के  उभार प्रभावित होते हैं।  वह ढीले पड़ने लगते हैं।  उनमें नई रक्त वाहिनियां उत्पन्न हो जाती हैं।  ज्यादा ढीले पड़ने पर ये उभार गुदामार्ग  से शौच के समय बाहर भी आने लगते हैं।  आकार ज्यादा होने पर मरीज को अपनी उँगलियों से उन्हें अंदर करना पड़ता है। इनके अंदर की रक्त वाहिनियाँ घर्षण के कारण फट जाती हैं तथा उनमें से रक्त भी आने लगता है।  यह रक्त सुर्ख लाल रंग का होता है तथा धार एवं बूंद-बूंद करके बाहर आता है।  सुर्ख लाल रंग होने के कारण यह अत्यंत भयानक दिखता है

इसके अतिरिक्त मरीज खुजली का अनुभव भी कर सकता है।  कभी-कभी सफेद पानी जैसा चिपचिपा तरल पदार्थ भी मरीज को गुदाद्वार पर महसूस हो सकता है।  इसे आंव या म्यूकस भी कहते हैं। ये भी बवासीर से ही रिसता है। 

बवासीर में हमारी जीवन शैली तथा खान-पान का विशेष प्रभाव  पड़ता है।अपनी दैनिक दिनचर्या तथा जीवन शैली में छोटे छोटे परिवर्तन करके हम कब्ज से छुटकारा पा सकते हैं। एक बार बवासीर पता चलने पर जीवन शैली में परिवर्तन करने आवश्यक हो जाते हैं।  आप यह परिवर्तन बिना रोग का पता चले भी कर सकते हैं।  इससे बवासीर रोग उत्पन्न ही नहीं होगा।  इसके अतिरिक्त अन्य बहुत सारी बीमारियों के होने से भी आप बच जाएंगे। 

हमको एक सक्रिय जीवन शैली का प्रारंभ करना है।  दिनभर एक स्थान पर नहीं बैठे रहना है।  चलते फिरते रहना है।  यदि हमारा बैठने का कार्य है, तो भी हर थोड़ी थोड़ी देर बाद हम को उठकर टहलना चाहिए। 

एक स्थान पर बैठे रहने से तथा टाइट फिटिंग कपड़े पहनने से हमारे शरीर के निचले हिस्से में रक्त एकत्रित होता चला जाता है।  तथा धीरे-धीरे रक्त वाहिकाओं में सूजन आ जाती है।  इस प्रकार बवासीर की शुरुआत हो जाती है। 

एक्टिव रहने के साथ-साथ हमें नियमित व्यायाम भी करना चाहिए।  व्यायाम के साथ साथ टहलना (वॉक)  भी हमारी आंतों के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। जब हम चलते हैं, हमारी आंतें भी चलने लगती हैं। 

हमको उस तरह के व्यायाम से बचना चाहिए जिनको करने से हमारे पेट के अंदर दबाव बढ़ता है।  जैसे भारी वजन उठाना आदि।  हमें योग, तैराकी तथा तेज तेज चलना चाहिए।  यह सब हमारे वजन को भी नियंत्रित रखते हैं। 

जल का अधिक सेवन 

सबसे महत्वपूर्ण है पानी को अपनी नियमित दिनचर्या में शामिल करना।  हमें दिन भर में 3 से 4 लीटर तरल पदार्थों का सेवन करना ही चाहिए।  सुबह उठते ही बिना कुल्ला किए तीन से चार गिलास गुनगुना पानी पियें। पानी घूँट घूँट  कर के पीयें , एकदम जल्दी से ना पियें।  तत्पश्चात दिन भर पानी पीते रहें।  खाने से आधा घंटा पहले तथा 1 घंटे बाद तक भी हमें पानी नहीं पीना चाहिए।  खाने के साथ पानी पीने से खाना पूरी तरह  पच नहीं पाता है।

अगर कोई चिकित्सक या डाइटिशियन हमसे यह कहता है तो हमारा सर्वप्रथम रिस्पॉन्स होता है कि हम बहुत पानी पीते हैं।  लेकिन यदि जब भी आप पानी पिए और इसको एक जगह लिखते चलें तो आपको पता चलेगा कि आप वास्तव में बहुत कम पानी पी रहे हैं। 

पानी की जगह आप फलों का रस अथवा छाछ भी पी सकते हैं।  नींबू के रस में थोड़ा काला नमक या शहद डालकर भी ले सकते हैं। 

लम्बे दस्त 

लंबे कब्ज के अतिरिक्त यदि लंबे समय तक मरीज को दस्त लगे रहे तब भी बवासीर के मस्से बन जाते हैं। बार बार शौच जाने से भी हमारी आंतें ढीली पड़ जाती हैं। 

आनुवांशिक

कुछ मरीजों में मस्से अनुवांशिक होते हैं।  उनके माता-पिता भी बवासीर से पीड़ित होते हैं तथा उनसे ही यह बीमारी उनके बच्चों में आती है। 

बवासीर से बचने के लिए इस परिवार के सभी सदस्यों को इस लेख में बताई गयीं सभी सावधानियों का पालन करना चाहिए। 


 रेशे का सेवन - डाइटरी फाइबर रिच फूड

रेशा हमें वनस्पतियों से मिलता है।  यह हमारे द्वारा खाई जाने वाली सब्जियों, फलों तथा अनाज से हमें मिलता है।  इस रेशे  को हमारी आंतें  पचा नहीं पाती हैं तथा यह गुदाद्वार से मल के साथ बाहर निकल जाता है। 

अपने भोजन में हमें धीरे-धीरे रेशे की मात्रा को बढ़ाना चाहिए।  अगर आपको गैस ज्यादा बनती है या फिर पेट फूला  सा रहता है तो अत्यधिक रेशे  के सेवन से परेशानी बढ़ सकती है। 

हमको प्रतिदिन लगभग 30 ग्राम रेशे का सेवन करना चाहिए।  एकरसता से बचने के लिए भोज्य  पदार्थों को बदल बदल कर खाएं।  

सब्जियां

सब्जियों में रेशे  की मात्रा प्रचुर मात्रा में होती है।  निम्न सब्जियों को बदल बदल कर अपने स्वाद के अनुसार खाना चाहिए।  

सलाद, सलाद की पत्तियां-लेट्यूस, कच्ची  गाजर, पालक, खीरा आदि 

चुकंदर शकरकंदी कद्दू ब्रोकोली गाजर चुकंदर गोभी, पत्ता गोभी, शलजम

फलियां 

मटर, मसूर की दाल, राजमा, चना आदि दालें

फल 

सेब छिलके सहित, केला, सूखे अंजीर, नाशपाती, आड़ू,रेस्पबेरीज, स्ट्रॉबेरी ब्लूबेरीज  

अनाज 

दलिया, जो, ओटमील, ब्राउन चावल   

नट्स 

बादाम, छिया सीड्स, पिस्ता, अखरोट 

फाइबर अथवा रेशा एक प्रकार का कार्बोहाइड्रेट होता है।  अन्य कार्बोहाइड्रेट्स को शरीर चीनी में परिवर्तित कर देता है, जिससे शरीर को ऊर्जा मिलती है।  लेकिन रेशा  शरीर में पचता नहीं है, यह हमारे शरीर से बिना पचे  मल में निकल जाता है।  

मुख्यतः दो प्रकार के रेशे पाए जाते हैं घुलनशील रेशा  तथा अघुलनशील रेशा

घुलनशील रेशा  

यह हमारे शरीर में पानी में घुलकर जेल जैसा एक गाढ़ा  सा पदार्थ बन जाता है।  यह अधपचे  खाने में मिलकर उस को आँतों मैं आगे बढ़ाने में मदद करता है। घुलनशील रेशे नियमित लेने से कब्ज नहीं होती है।  रेशे  के कारण खाद्य पदार्थ तेजी से आँतों  में आगे बढ़ते रहते हैं।  वह एक ही जगह पर पड़े पड़े सूखते नहीं रहते हैं

ये  ओट्स, जौ, राजमा, मसूर की दाल, सेब, संतरा, शकरकंदी, रेस्पवेरी आदि से हमें मिलता है। 

अघुलनशील रेशा 

इस प्रकार के रेशे पानी को सोखते  जाते हैं तथा खाने के कूड़े करकट को समेट कर बाहर निकालने में मदद करते हैं।  यह खाद्य पदार्थों के बाहरी छिलके से बनते हैं जैसे- सेब, नाशपाती, आलू, साबुत गेहूं की ब्रेड, गेहूं का चोकर, मक्का, राजमा, सोते की गई पत्तेदार तथा अंकुरित सब्जियां। 

वजन 

अधिक वजन होने से हमारे पेट पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।  इसलिए मोटे लोगों में बवासीर होने की संभावनायें  अधिक होती हैं।  अपने वजन को बढ़ने ना दें।  उचित व्यायाम तथा समुचित भोजन से हम अपने शरीर को स्वस्थ रख सकते हैं। 

गर्भावस्था 

इस अवस्था में शरीर के निचले हिस्से पर दबाब बढ़ता है।  शरीर के खून भी सही तरह से निकासी नहीं हो पाती है। 

ज्यादातर महिलाएं बवासीर की शिकार हो जाती हैं। बच्चे के जनम के बाद उन्हें बहुत सावधानियां बरतनी चाहिए। 

हाईली प्रोसेस फूड 

खाने को तैयार खाद्य पदार्थ, डिब्बा बंद भोजन, पोटैटो चिप्स, फ़ास्ट फूड्स, फ्रोजेन फूड्स, तले हुए भोज्य पदार्थ बहुत भारी होते हैं तथा आसानी से नहीं पचते हैं। इनमें नमक एवं चीनी ज्यादा होती है, गन्दी चिकनाई होती है। ये हमारे स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव डालती हैं। इनसे हमारा खाना सही तरह से पच नहीं पता है तथा कब्ज की शुरुआत हो जाती है।   

इस तरह के भोज्य पदार्थों को हमें सेवन करने से बचना चाहिए। 

शौच 

शौच  जाना हमारे शरीर की एक आदत सा होता है।  लगभग प्रतिदिन हमको उसी नियमित समय पर शौच जाने का मन करता है।  जब कभी आपको शौच लगे तो तुरंत शौच करने जाना चाहिए, कभी भी इसको टालना नहीं चाहिए।  शौच न करने पर मल अंदर ही अंदर सूखता रहता है।  बाद में शौच करने पर आपकी आँतों  को अतिरिक्त बल का प्रयोग करना पड़ता है। यह भी बवासीर की शुरुआत हो  सकती  है। 

शौच करते समय अतिरिक्त बल का उपयोग करने से गुदा मार्ग के द्वार पर उपस्थित उभारों की नसें  फूलने लगती है। नसों के छिलने से खून आता है। 

शौच के समय कमोड के ऊपर लंबे समय तक बैठना नहीं चाहिए।  कुछ लोग वहां अखबार अथवा किताबें पढ़ते रहते हैं, मोबाइल पर समय व्यतीत करते हैं।  यह सर्वथा अनुचित है।  ज्यादा समय तक कमोड पर बैठने से बवासीर बनने लगती है। 

ज्यादा भारी वजन उठाने से, बार बार खांसी आने से या गर्भावस्था में भी पेट में दबाव बढ़ जाता है।  यदि यह दबाव कम नहीं होता है तो बवासीर के मस्से बनते चले जाते हैं।  उनका आकार बड़ा तथा  भयावह भी हो जाता है। जब यह मस्से  छिल जाते हैं तो इनसे तेज रक्त भी मल  के समय आ सकता है। 

बवासीर से पीड़ित मरीज़  खून आने के भय  से शौच ही नहीं जाते हैं।  यदि शौच जाते भी हैं तो खून देखकर पूरी तरह शौच करे बिना बीच में ही उठ जाते हैं।  बड़ी आंतों में मल सूखता रहता है तथा उसे  बाहर निकलने में मरीज को फिर अतिरिक्त बल लगाना पड़ता है।  फिर से खून आता है तथा मरीज सही नहीं हो पाता है। 

बवासीर लाइलाज बीमारी नहीं है। लेकिन है तो एक बीमारी। समय रहते इससे बचाव करने में ही समझदारी है। 



अगर आप मुझसे कुछ पूछना चाहें तो 9837144287  पर व्हाट्सएप्प कर सकते हैं।

डॉ पुनीत अग्रवाल MS  

प्रॉक्टोलॉजिस्ट 

गुदा रोग विशेषज्ञ 

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